पूर्णा - 'नहीं बाबूजी, इतनी जल्दी न कीजिए। जरा सोच लेने दीजिए।'
कमलाप्रसाद - 'इसमें सोचने की कौन-सी बात है। अकेले कैसे पड़ी रहोगी?'
पूर्णा - 'अकेली तो नहीं हूँ महरी भी तो यहीं सोने को कहती है।'
कमलाप्रसाद - 'अच्छा, वह बिल्लो। हाँ बुढ़िया है तो सीधी; लेकिन टर्री है। आखिर मेरे घर चलने में तुम्हें क्या असमंजस है?'
पूर्णा - 'कुछ नहीं, असमंजस क्या है?'
कमलाप्रसाद - 'तो आदमियों को जा कर भेज दूँ।'
पूर्णा - 'भेज दीजिएगा, अभी जल्दी क्या है?'
कमलाप्रसाद - 'तुम व्यर्थ ही इतना संकोच कर रही हो पूर्णा, क्या तुम समझती हो तुम्हारा जाना मेरे घर के प्राणियों को बुरा लगेगा?'
कमलाप्रसाद का अनुमान ठीक था। पूर्णा को वास्तव में यही आपत्ति थी, पर वह संकोच-वश इसे प्रकट न कर सकती थी। उसने समझा, बाबू जी ने मेरे मन की बात ताड़ ली। इससे वह
पूर्णा - 'वाह, उबटन क्यों न मलवाओगे? आज की तो यह रीति है, आके बैठ जाव।'
पूर्णा ने लपक कर उनका हाथ पकड़ लिया और उबटन भरा हाथ उनकी देह में पोत दिया। तब बोली -'सीधे से कहती थी, तो नहीं मानते थे अब तो बैठोगे।'
पूर्णा - 'अब गंगा जी कहाँ जाओगे। यहीं नहा लेना।।'
पूर्णा - 'अच्छा, तो जल्दी लौट आना, यह नहीं कि इधर-उधर तैरने लगो। नहाते वक्त तुम बहुत दूर तैर जाया करते हो।'
मगर वहाँ जा कर देखा तो फूल इतनी ही दूर