लज्जित भी हो गई। बाबू साहब के घर वालों के विषय में ऐसी धारणा उसे न करनी चाहिए थी, पर कमलाप्रसाद ने उसके संकोच का शीघ्र ही अंत कर दिया, बोले - 'तुम्हारा यह अनुमान बिल्कुल स्वाभाविक है, पूर्णा लेकिन सोचो, मेरे घर में ऐसा कौन-सा आदमी है जो तुम्हारा विरोध कर सके। बाबू जी की स्वयं यह इच्छा है। मुझे तुम खूब जानती हो। पं. वसंत कुमार से मेरी कितनी गहरी दोस्ती थी, यह तुमसे छिपा नहीं, प्रेमा तुम्हारी सहेली ही है, अम्माँ जी को तुमसे कितना प्रेम है, वह तुम खूब जानती ही हो, रह गई सुमित्रा, उसे जरा कुछ बुरा लगेगा। तुमसे कोई परदा नहीं, लेकिन उसकी बातों की परवाह कौन करता है? उसे खुश रखने का भी तुम्हें एक गुर बताए देता हूँ। कभी-कभी यह मंत्र फूँक दिया करना, फिर वह कभी तुम्हारी बुराई न करेगी। बस उसकी सुंदरता की तारीफ करती रहना। यह न समझना कि रंभा


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और आगे थे। अब कुछ थकान मालूम होने लगी थी, किंतु बीच में कोई रेत ऐसा न था कि जिस पर बैठ कर दम लेते। आगे बढ़ते ही गए। कभी हाथों से जोर मारते, कभी पैरों से जोर लगाते फूलों तक पहुँचे। पर, उस वक्त तक सारे अंग शिथिल हो गए थे। यहाँ तक कि फूलों को लेने के लिए जब हाथ लपकाना चाहा, तो हाथ न उठ सका। आखिर उनको दाँतों में दबाया और लौटे। मगर, जब वहाँ से उन्होंने किनारे की तरफ देखा तो ऐसा मालूम हुआ, मानो एक हजार कोस की मंजिल है। शरीर


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