या उर्वशी कहने से वह समझ जाएगी कि यह मुझे बना रही है। तुम चाहे जितना बढ़ाओ, वह उसे यथार्थ ही समझेगी। इसी मंत्र से मैं उसे नचाया करता हूँ यही मंत्र तुम्हें बताए देता हूँ।'

पूर्णा को हँसी आ गई, बोली - 'आप तो उनकी हँसी उड़ा रहे हैं भला ऐसा कौन होगा, जिसे इतनी समझ न हो।'

कमलाप्रसाद - 'इतनी समझ को तुम साधारण बात समझ रही हो, पर यह साधारण बात नहीं। तुमको यह सुन कर आश्चर्य तो होगा, पर अपनी तारीफ सुन कर हम इतने मतवाले हो जाते हैं कि फिर हममें विवेक की शक्ति ही लुप्त हो जाती है। बड़े-से-बड़ा महात्मा भी अपनी प्रशंसा सुन कर फूल उठता है। हाँ, प्रशंसा करने वाले शब्दों में भक्ति का भाव रहना आवश्यक है। यदि ऐसा न होता, तो कवियों को झूठी तारीफों के पुल बाँधने के लिए हमारे राजे-महाराजे पुरस्कार क्यों देते। बताओ? राजा साहब तमंचे की आवाज


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बिल्कुल अशक्त हो गया था और जल-प्रवाह भी प्रतिकूल था। उनकी हिम्मत छूट गई। हाथ-पाँव ढीले पड़ गए। आस-पास कोई नाव या डोंगी न थी और न किनारे तक आवाज ही पहुँच सकती थी। समझ गए, यहीं जल-समाधि होगी। एक क्षण के लिए पूर्णा की याद आई। हाय, वह उनकी बाट देख रही होगी, उसे क्या मालूम कि वह अपनी जीवन-लीला समाप्त कर चुके। वसंत कुमार ने एक बार फिर जोर मारा, पर हाथ पाँव हिल न सके। तब उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। तट पर लोगों ने डूबते


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