सुन कर चौंक पड़ते हैं, कानों में उँगली डाल लेते हैं और घर में भागते हैं, पर दरबार का कवि उन्हें वीरता में अर्जुन और द्रोणाचार्य से दो हाथ और ऊँचा उठा देता है, तो राजा साहब की मूँछें खिल उठती हैं, उन्हें एक क्षण के लिए भी यह ख्याल नहीं आता कि यह मेरी हँसी उड़ाई जा रही है। ऐसी तारीफों में हम शब्दों को नहीं, उनके अंदर छिपे हुए भावों को ही देखते हैं। सुमित्रा रंग-रूप में अपने बराबर किसी को नहीं समझती। न जाने उसे यह खब्त कैसे हो गया। यह कहते बहुत दु:ख होता है पूर्णा, पर इस स्त्री के कारण मेरी जिंदगी खराब हो गई। मुझे मालूम ही न हुआ कि प्रेम किसे कहते हैं। मैं संसार में सबसे अभागा प्राणी हूँ और क्या कहूँ। पूर्व जन्म के पापों का प्रायश्चित कर रहा हूँ। सुमित्रा से बोलने को जी नहीं चाहता, पर मुँह से कुछ नहीं कहता कि कहीं घर में कुहराम न मच जाए। लोग समझते हैं,
देखा। दो-चार आदमी पानी में कूदे, पर एक ही क्षण में वसंत कुमार लहरों में समा गए। केवल कमल के फूल पानी पर तैरते रह गए, मानो उस जीवन का अंत हो जाने के बाद उसकी अतृप्त लालसा अपनी रक्त-रंजित छटा दिखा रही हो।
अध्याय 4
लाला बदरीप्रसाद की सज्जनता प्रसिद्ध थी। उनसे ठग कर तो कोई एक पैसा भी न ले सकता था, पर धर्म के विषय में वह बड़े ही उदार थे। स्वार्थियों से वह कोसों भागते थे, पर दीनों की सहायता करने में भी न चूकते थे। फिर पूर्णा तो