मैं आवारा हूँ, सिनेमा और थिएटर में प्रमोद के लिए जाता हूँ, लेकिन मैं तुमसे सत्य कहता हूँ पूर्णा, मैं सिनेमा में केवल अपनी हार्दिक वेदनाओं को भुलाने के लिए जाता हूँ, अपनी अतृप्त अभिलाषाओं को और कैसे शांत करूँ, दिल की आग को कैसे बुझाऊँ। कभी-कभी जी में आता है, संन्यासी हो जाऊँ और कदाचित एक दिन यही करना पड़ेगा। तुम समझती होगी, यह महाशय कहाँ का पचड़ा ले बैठे। क्षमा करना, न जाने आज क्यों तुमसे ये बातें करने लगा। आज तक मैंने इन भावों को किसी से प्रकट नहीं किया था। व्यक्ति हृदय ही से सहानुभूति की आशा होती है, बस यही समझ लो। तो मैं जा कर आदमियों को भेजे देता हूँ, तुम्हारा असबाब उठा ले जाएँगे।'
पूर्णा को अब क्या आपत्ति हो सकती थी। उसका जी अब भी इस घर को छोड़ने को न चाहता था, पर वह इस अनुरोध को टाल न सकी। उसे यह भय भी हुआ कि कहीं यह मेरे
उनकी पड़ोसिन ही नहीं, ब्राह्मणी थी। उस पर उनकी पुत्री की सहेली। उसकी सहायता वह क्यों न करते? पूर्णा के पास हल्के दामों के दो-चार गहनों के सिवा और क्या था। षोडसी के दिन उसने वे सब गहने ला कर लाला जी के सामने रख दिए, और सजल नेत्रों से बोली - 'मैं अब इन्हें रख कर क्या करूँगी।'
बदरीप्रसाद ने करुण-कोमल स्वर में कहा - 'मैं इन्हें ले कर क्या करूँगा, बेटी? तुम यह न समझो कि मैं धर्म या पुण्य समझ कर यह काम कर रहा हूँ। यह मेरा कर्तव्य है। इन गहनों