इनकार से और भी दुःखी न हो जाएँ। आश्रयविहीन अबला के लिए इस समय तिनके का सहारा ही बहुत था, तो वह नौका की कैसे अवहेलना करती, पर वह क्या जानती थी कि वह उसे उबारने वाली नौका नहीं वरन एक विचित्र जल-जंतु है, जो उसकी आत्मा को निगल जाएगा?
अध्याय 5
पूर्णा को अपने घर से निकलते समय बड़ा दुःख होने लगा। जीवन के तीन वर्ष इसी घर में काटे थे। यहीं सौभाग्य के सुख देखे, यहीं वैधव्य के दुःख भी देखे। अब उसे छोड़ते हुए हृदय फट जाता था। जिस समय चारों कहार उसका असबाब उठाने के लिए घर आए, वह सहसा रो पड़ी। उसके मन में कुछ वैसे ही भाव जाग्रत हो गए, जैसे शव को उठाते समय शोकातुर प्राणियों के मन में आ जाते हैं। यह जानते हुए भी कि लाश घर में नहीं रह सकती, जितनी जल्द उसका दाहसंस्कार क्रिया हो जाए उतना ही अच्छा है। वे एक क्षण के लिए
को अपने पास रखो। कौन जाने किस वक्त इनकी जरूरत पड़े। जब तक मैं जीता हूँ, तुम्हें अपनी बेटी समझता रहूँगा। तुम्हें कोई तकलीफ न होगी।'
षोडसी बड़ी धूम से हुई। कई सौ ब्राह्मणों ने भोजन किया। दान-दक्षिणा में भी कोई कमी न की गई।
रात के बारह बज गए थे। लाला बदरीप्रसाद ब्राह्मणों को भोजन करा के लेटे, तो देखा - प्रेमा उनके कमरे में खड़ी है। बोले - 'यहाँ क्यों खड़ी हो, बेटी - रात बहुत हो गई, जा कर सो रहो।'
प्रेमा - 'आपने अभी कुछ भोजन नहीं किया है न?'