मोह के आवेश में आ कर पाँव से चिमट जाते हैं, और शोक से विह्वल हो कर करूण स्वर में रूदन करने लगते हैं, वह आत्म-प्रवंचना, जिसमें अब तक उन्होंने अपने को डाल रखा था कि कदाचित अब भी जीवन के कुछ चिह्न प्रकट हो जाएँ, एक परदे के समान आँखों के सामने से हट जाती है और मोह का अंतिम बंधन टूट जाता है, उसी भाँति पूर्णा भी घर के एक कोने में दीवार से मुँह छिपा कर रोने लगी। अपने प्राणेश की स्मृति का यह आधार भी शोक के अपार सागर में विलीन हो रहा था। उस घर का एक-एक कोना उसके लिए मधुर-स्मृतियों से रंजित था, सौभाग्य-सूर्य के अस्त हो जाने पर भी यहाँ उसकी कुछ झलक दिखाई देती थी। सौभाग्य-संगीत का अंत हो जाने पर भी यहाँ उसकी प्रतिध्वनि आती रहती थी। घर में विचरते हुए उसे अपने सौभाग्य का विषादमय गर्व होता रहता था। आज सौभाग्य-सूर्य का वह अंतिम प्रकाश
बदरीप्रसाद - 'अब इतनी रात गए मैं भोजन न करूँगा। थक भी बहुत गया हूँ। लेटते ही लेटते सो जाऊँगा।'
यह कह कर बदरीप्रसाद चारपाई पर बैठ गए और एक क्षण के बाद बोले - 'क्यों बेटी, पूर्णा के मैके कोई नहीं है? मैंने उससे नहीं पूछा कि शायद उसे कुछ दुःख हो।'
प्रेमा - 'मैके में कौन है। माँ-बाप पहले ही मर चुके थे, मामा ने विवाह कर दिया। मगर जब से विवाह हुआ, कभी झाँका तक नहीं। ससुराल में भी सगा कोई नहीं है। पंडित जी के दम से नाता था।'