कमलाप्रसाद ने कपड़े भी नहीं उतारे। क्रोध में भरे हुए घर में आ कर माँ से पूछा - 'क्या अम्माँ, बदलू तुमसे बर्फ के लिए पैसे लेने आया था?'

कमलाप्रसाद - 'नहीं, उनसे तो भेंट नहीं हुई। उनकी तरफ गया तो था, लेकिन जब सुना कि वह किसी सभा में गए हैं, तो मैं सिनेमा चला गया। सभाओं का तो उन्हें रोग है और मैं उन्हें बिल्कुल फिजूल समझता हूँ। कोई फायदा नहीं। बिना व्याख्यान सुने भी आदमी जीता रह सकता है और व्याख्यान देने वालों के बगैर भी दुनिया के रसातल चले जाने की संभावना नहीं। जहाँ देखो वक्ता-ही-वक्ता नजर आते हैं, बरसाती मेढकों की तरह टर्र-टर्र किया और चलते हुए। अपना समय गँवाया और दूसरों को हैरान किया। सब-के-सब मूर्ख हैं।'

कमलाप्रसाद ने जोर से कहकहा मार कर कहा - 'और ये सभाओंवाले क्या करेंगे। यही सब तो इन सभी को सूझती है। लाला अब किसी विधवा


4 of 180

आँखों से कहा - 'माँ-बाप किसके सदा बैठे रहते हैं बेटी! अपनी आँखों के सामने जो काम हो जाए, वही अच्छा! लड़की तो उनकी नहीं क्वाँरी रहने पाती, जिनके घर में भोजन का ठिकाना नहीं। भिक्षा माँग कर लोग कन्या का विवाह करते हैं। मोहल्ले में कोई लड़की अनाथ हो जाती है, तो चंदा माँग कर उसका विवाह कर दिया जाता है। मेरे यहाँ किस बात की कमी है। मैं तुम्हारे लिए कोई और वर तलाश करूँगी। यह जाने-सुने आदमी थे, इतना ही था, नहीं तो बिरादरी में एक से एक पड़े हुए हैं। मैं कल ही तुम्हारे बाबूजी को भेजती हूँ।'


4 of 297