मिटा जा रहा था, सौभाग्य-संगीत की प्रतिध्वनि एक अनंत शून्य में डूबी जाती थी, वह विषादमय गर्व हृदय को चीर कर निकला जाता था।
संध्या समय वह अपनी महरी बिल्लो के साथ रोती हुई इस भाँति चली मानो कोई निर्वासित हो। पीछे फिर-फिर कर अपने प्यारे घर को देखती जाती थी, मानो उसका हृदय वहीं रह गया हो।
देवकी को सुमित्रा की कोई बात न भाती थी। उसका हँसना-बोलना, चलना-फिरना, उठना-बैठना, पहनना-ओढ़ना सभी उन्हें फूहड़पन की चरम सीमा का अतिक्रमण करता हुआ जान पड़ता था, और वह नित्य उसकी प्रचंड आलोचना करती रहती थी। उसकी आलोचना में प्रेम और सद्भाव का आधिक्य था या द्वेष का, इसका निर्णय करना कठिन था। सुमित्रा तो द्वेष ही समझती थी। इसीलिए वह उन्हें और भी चिढ़ाती रहती थी - देवकी सबेरे उठने का उपदेश करती थी, सुमित्रा पहर दिन चढ़े उठती थी, देवकी घूँघट
बदरीप्रसाद ने बिछावन की चादर बराबर करते हुए कहा - 'मैं सोच रहा हूँ, पूर्णा को अपने ही घर में रखूँ तो क्या हरज है? अकेली औरत कैसे रहेगी।'
प्रेमा - 'होगा तो बहुत अच्छा, पर अम्माँ जी मानें तब तो?'
बदरीप्रसाद - 'मानेगी क्यों नहीं, पूर्णा तो इनकार न करेगी?'
प्रेमा - 'पूछूँगी। मैं समझती हूँ उन्हें इनकार न होगा।'
बदरीप्रसाद - 'अच्छा मान लो, वह अपने ही घर में रहे तो उसका खर्च बीस रुपए में चल जाएगा न?'
प्रेमा ने आर्द्र नेत्रों से पिता की