निकालने को कहती थी, सुमित्रा इसके जवाब में आधा सिर खुला रखती थी। देवकी महरियों से अलग रहने की शिक्षा देती थी, सुमित्रा महरियों से हँसी-दिल्लगी करती रहती थी। सुमित्रा को पूर्णा का यहाँ आना अच्छा नहीं लग रहा है, यह उससे छिपा न रह सका, पहले ही से उसने पति के इस प्रस्ताव पर नाक सिकोड़ी थी। पर, यह जानते हुए कि इनके मन में जो इच्छा है उसे यह पूरा ही करके छोड़ेंगे, उसने विरोध करके अपयश लेना उचित न समझा था। सुमित्रा सास के मन के भाव ताड़ रही थी। और यह भी जानती थी कि पूर्णा भी अवश्य ही ताड़ रही है। इसलिए पूर्णा के प्रति उसके मन में स्नेह और सहानुभूति उत्पन्न हो गई। अब तक देवकी पूर्णा को आदर्श गृहिणी कह कर बखान करती रहती थी। उसको दिखा कर सुमित्रा को लज्जित करना चाहती थी। इसलिए सुमित्रा पूर्णा से जलती थी। आज देवकी के मन में वह भाव न था, इसलिए सुमित्रा के मन में भी वह भाव न रहा।


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ओर देख कर कहा - 'बड़े मजे से। पंडित जी पचास रुपए ही तो पाते थे।'

बदरीप्रसाद ने चिंतित भाव से कहा - 'मेरे लिए बीस, पच्चीस, साठ सब बराबर हैं, लेकिन मुझे अपनी जिंदगी ही की तो नहीं सोचनी है। अगर आज मैं न रहूँ, तो कमलाप्रसाद कौड़ी फोड़ कर न देगा, इसलिए कोई स्थायी बंदोबस्त कर जाना चाहता हूँ। अभी हाथ में रुपए नहीं हैं, नहीं तो कल ही चार हजार रुपए उनके नाम किसी अच्छे बैंक में रख देता। सूद से उसकी परवरिश होती रहती। यह शर्त कर देता कि मूल में से कुछ न दिया जाए।'


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