ग्यारह बजे थे। पूर्णा प्रकाश में आँखें हटा कर खिड़की के बाहर अंधकार की ओर देख रही थी। उस गहरे अँधेरे में उसे कितने सुंदर दृश्य दिखाई दे रहे थे - वही अपना खपरैल का घर था, वही पुरानी खाट थी, वही छोटा-सा आँगन था, और उसके पतिदेव दफ्तर से आ कर उसकी ओर साहस मुख और सप्रेम नेत्रों से ताकते हुए जेब से कोई चीज निकाल कर उसे दिखाते और फिर छिपा लेते थे। वह बैठी पान लगा रही थी, झपट कर उठी और पति के दोनों हाथ पकड़ कर बोली - 'दिखा दो क्या है? पति ने मुट्ठी बंद कर ली। उसकी उत्सुकता और बढ़ी उसने खूब जोर लगा कर मुट्ठी खोली, पर उसमें कुछ न था। वह केवल कौतुक था। आह! उस कौतुक, उस क्रीड़ा में उसे अपने जीवन की व्याख्या छिपी हुई मालूम हो रही थी।'
पूर्णा ने आँसू पोंछ डाले और आवाज सँभाल कर बोली - 'यह तो तुम झूठ कहती हो बहन। यह सोचती तो तुम आती क्यों?'
सहसा कमलाप्रसाद आँखें मलते हुए आ कर खड़े हो गए और बोले - 'अभी आप सोए नहीं? गरमी लगती हो, तो पंखा ला कर रख दूँ। रात तो ज्यादा हो गई।'
बदरीप्रसाद - 'नहीं गरमी नहीं है। प्रेमा से कुछ बातें करने लगा था। तुमसे भी कुछ सलाह लेना चाहता था, तो तुम आप ही आ गए। मैं यह सोच रहा हूँ कि पूर्णा यहीं आ कर रहे तो क्या हरज है?'
कमलाप्रसाद ने आँखें फाड़ कर कहा - 'यहाँ! अम्माँ जी कभी न राजी होंगी।'
बदरीप्रसाद - 'अम्माँ जी की बात छोड़ो, तुम्हें तो कोई आपत्ति नहीं है? मैं तुमसे पूछना चाहता हूँ।'