पूर्णा ने कुछ आशंकित हो कर पूछा - 'तुम अब तक कैसे जाग रही हो?'
पूर्णा - 'तो क्यों सोती हो सारे दिन?'
सुमित्रा हँसने लगी। एक क्षण में सहसा उसका मुख गंभीर हो गया। बोली - 'अपने माता-पिता की धन-लिप्सा का प्रायश्चित कर रही हूँ, बहन और क्या।' यह कहते-कहते उसकी आँखें सजल हो गई।
सुमित्रा किसी अंतर्वेदना से विकल हो कर बोली - 'तुम देख लेना बहन, एक दिन यह महल ढह जाएगा। यही अभिशाप मेरे मुँह से बार-बार निकलता है।' पूर्णा ने विस्मित हो कर कहा - 'ऐसा क्यों कहती हो बहन? फिर उसे एक बात याद हो गई। पूछा - 'क्या अभी भैयाजी नहीं आए?'
पूर्णा ने एक लंबी साँस खींच कर कहा - 'मेरे भाग्य से अपने भाग्य की तुलना न करो, बहन पराश्रय से बड़ी विपत्ति दुर्भाग्य के कोश में नहीं है।'
सुमित्रा चली गई। पूर्णा ने बत्ती बुझा दी और लेटी, पर
कमलाप्रसाद ने दृढ़ता से कहा - 'मैं तो कभी इसकी सलाह न दूँगा। दुनिया में सभी तरह के आदमी हैं, न जाने क्या समझें। दूर तक सोचिए।'
बदरीप्रसाद - 'उसके पालन-पोषण का तो कुछ प्रबंध करना ही होगा।'
कमलाप्रसाद - 'हम क्या कर सकते हैं?'
बदरीप्रसाद - 'तो और कौन करेगा?'
कमलाप्रसाद - 'शहर में हमीं तो नहीं रहते। और भी बहुत से धनी लोग हैं। अपनी हैसियत के मुताबिक हम भी कुछ सहायता कर देंगे।'
बदरीप्रसाद ने कटाक्ष-भाव से कहा