नींद कहाँ? आज ही उसने इस घर में कदम रखा था और आज ही उसे अपनी जल्दबाजी पर खेद हो रहा था। यह निश्चय था कि वह बहुत दिन यहाँ न रह सकेगी।
अध्याय 6
लाला बदरीप्रसाद के लिए अमृतराय से अब कोई संसर्ग रखना असंभव था, विवाह तो दूसरी बात थी। समाज में इतने घोर अनाचार का पक्ष ले कर अमृतराय ने अपने को उनकी नजरों से गिरा दिया। उनसे अब कोई संबंध करना बदरीप्रसाद के लिए कलंक की बात थी। अमृतराय के बाद दाननाथ से उत्तम वर उन्हें कोई और न दिखाई दिया। अधिक खोज-पूछ करने का अब समय भी न था। अमृतराय के इंतजार में पहले ही बहुत बिलंब हो चुका था, बिरादरी में लोग उँगलियाँ उठाने लगे थे। नए संबंध की खोज में विवाह के एक अनिश्चित समय तक टल जाने का भय था। इसलिए मन इधर-उधर न दौड़ा कर उन्होंने दाननाथ ही से बात पक्की
- 'तो चंदा खोल दिया जाए, क्यों? अच्छी बात है, जाओ घूम-घूम कर चंदा जमा करो।'
कमलाप्रसाद - 'मैं क्यों चंदा जमा करने लगा।'
बदरीप्रसाद - 'तब कौन करेगा?'
कमलाप्रसाद इसका कुछ जवाब न दे सके। कुछ देर के बाद बोले - 'आखिर आपने क्या निश्चय किया है?'
बदरीप्रसाद - 'मैं क्या निश्चय करूँगा? मेरे निश्चय का अब मूल्य ही क्या? निश्चय तो वही है, जो तुम करो। मेरा क्या ठिकाना? आज मैं कुछ कर जाऊँ, कल मेरी आँख बंद होते ही तुम उलट-पुलट दो, व्यर्थ में बदनामी हो।'