करने का निश्चय कर लिया। देवकी ने भी कोई आपत्ति न की। प्रेमा ने इस विषय में उदासीनता प्रकट की। अब उसके लिए सभी पुरुष समान थे, वह किसी के साथ जीवन का निर्वाह कर सकती थी। उसकी चलती तो वह अविवाहिता ही रहना पसंद करती, पर जवान लड़की बैठी रहे, यह कुल के लिए घोर अपमान की बात थी। इस विषय में किसी प्रकार का दुराग्रह करके वह माता-पिता का दिल न दुखाना चाहती थी। जिस दिन अमृतराय ने वह भीषण प्रतिज्ञा की, उसी दिन प्रेमा ने समझ लिया कि अब जीवन में मेरे लिए सुख लोप हो गया, पर अविवाहिता रह कर अपनी हँसी कराने की अपेक्षा किसी की हो कर रहना कहीं सुलभ था। आज दो-तीन साल पहले दाननाथ ही से उसके विवाह की बातचीत हो रही थी, यह वह जानती ही थी बीच में परिस्थिति न बदल गई होती, तो आज वह दाननाथ के घर होती। दाननाथ को वह कई
कमलाप्रसाद ने बहुत दुःखित हो कर कहा - 'आप मुझे इतना नीच समझते हैं। यह मुझे न मालूम था।'
बदरीप्रसाद बेटे को बहुत प्यार करते थे, यह देख कर कि मेरी बात से उसे चोट लगी है, तुरंत बात बनाई - 'नहीं-नहीं मैं तुम्हें नीच नहीं समझता। बहुत संभव है कि आज हम जो बात कर सकते हैं, वह कल स्थिति के बदल जाने से न कर सकें।'
कमलाप्रसाद - 'ईश्वर न करे कि मैं वह विपत्ति झेलने के लिए बैठा रहूँ, लेकिन इतना कह सकता हूँ कि आप जो कुछ