बार देख चुकी थी। वह रसिक हैं, सज्जन हैं, विद्वान हैं, यह उसे मालूम था। उनकी सच्चरित्रता पर भी किसी को संदेह न था, देखने में भी बहुत ही सजीले-गठीले आदमी थे। ब्रह्मचर्य की कांति मुख पर झलकती थी। उससे उन्हें प्रेम था, यह भी उससे छिपा न था। आँखें हृदय के भेद खोल ही देती हैं। अमृतराय ने हँसी-हँसी में प्रेमा से इसकी चर्चा भी कर दी थी। यह सब होते हुए प्रेमा को इनका जो कुछ खयाल था, वह इतना ही था कि वह अमृतराय के गहरे दोस्त हैं। उनमें बड़ी घनिष्ठता है। वह धनी नहीं थे, पर यह कोई ऐब न था, क्योंकि प्रेमा विलासिनी न थी। क्यों उसका मन अमृतराय की ओर बढ़ता था और दाननाथ की ओर से खिंचता था, इसका कोई कारण वह स्पष्ट नहीं कर सकती थी, पर इस परिस्थिति में उसके लिए और कोई उपाय नहीं था। फिर भी अब तक उसने दाननाथ को कभी इस दृष्टि से न देखा


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कर जाएँगे, उसमें कमलाप्रसाद को कभी किसी दशा में आपत्ति न होगी। आप घर के स्वामी हैं। आप ही ने यह संपत्ति बनाई है। आपको इस पर पूरा अधिकार है। निश्चय करने के पहले मैं जो चाहे कहूँ, लेकिन जब आप एक बात तय कर देंगे, तो मैं उसके विरुद्ध जीभ तक न हिलाऊँगा।'

बदरीप्रसाद - 'तो कल पूर्णा के नाम चार हजार रुपए बैंक में जमा कर दो और यह शर्त लगा दो कि मूल में से कुछ न ले सके। उसके बाद रुपए हमारे हो जाएँगे।'

कमलाप्रसाद को मानो चोट-सी लगी। बोले - 'खूब सोच लीजिए।'


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