था। उसने मन में एक संकल्प कर लिया था। अब हृदय में वह स्थान खाली हो जाने के बाद दाननाथ को वहाँ प्रतिष्ठित करने में उसे क्षोभ नहीं हुआ। उसने मन को टटोल कर देखा, तो उसे ऐसा मालूम हुआ कि वह दाननाथ से प्रेम भी कर सकती है। बदरीप्रसाद विवाह के विषय में उसकी अनुमति आवश्यक समझते थे। कितनी ही बातों में वह बहुत ही उदार थे। प्रेमा की अनुमति पाते ही उन्होंने दाननाथ के पास पैगाम भेज दिया।

अंत में बहुत सोचने-विचारने के बाद उन्होंने यही स्थिर किया कि एक बार अमृतराय को फिर टटोलना चाहिए। यदि अब भी उनका मत वह बदल सके, तो उन्हें आनंद ही होगा, इसमें कोई संदेह न था। जीवन का सुख तो अभिलाषा में है। यह अभिलाषा पूरी हुई, तो कोई दूसरी खड़ी होगी। जब एक-न-एक अभिलाषा का रहना निश्चित है, तो यही क्यों न रहे? इससे सुंदर, आनंदप्रद और कौन-सी


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बदरीप्रसाद ने निश्चयात्मक स्वर में कहा - 'खूब सोच लिया है। देखना केवल यह है कि इसे स्वीकार करती है या नहीं।'

कमलाप्रसाद - 'क्या उसके स्वीकार करने में भी कोई संदेह है?'

बदरीप्रसाद ने तिरस्कार-भाव से कहा - 'तुम्हारी यह बड़ी बुरी आदत है कि तुम सब को स्वार्थी समझने लगते हो। कोई भला आदमी दूसरों का एहसान सिर पर नहीं लेना चाहता। मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है। गए घरों की बात जाने दो, लेकिन जिसमें आत्म-सम्मान का कुछ भी अंश है, वह दूसरों की सहायता


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