अभिलाषा हो सकती है? इसके सिवा यह भय भी था कि कहीं जीवन का यह अभिनय वियोगांत न हो। प्रथम प्रेम कितना अमिट होता है, यह वह खूब जानते थे।

प्रकाश की एक सूक्ष्म रेखा चिक में प्रवेश करती हुई अमृतराय के मुख पर पड़ी। अमृतराय चौंक पड़े। वह मुख पीतवर्ण हो रहा था। आठ-दस दिन पहले जो कांति थी, उसका कहीं नाम तक न था। घबरा कर कहा - 'यह तुम्हारी क्या दशा है? कहीं लू तो नहीं लग गई? कैसी तबीयत है?'

दाननाथ हँस पड़े, पर अमृतराय को हँसी नहीं आई। गंभीर स्वर में बोले - 'सारी दुनिया के सिद्धांत चाटे बैठे हो, अभी स्वास्थ्य-रक्षा पर बोलना पड़े तो इस विषय के पंडितों को भी लज्जित कर दोगे, पर इतना नहीं हो सकता कि शाम को सैर ही कर लिया करो।'

इन उच्छृंखल शब्दों में विनोद के साथ कितनी आत्मीयता, कितना प्रगाढ़ स्नेह भरा हुआ था कि दोनों ही मित्रों की


48 of 180

नहीं लेना चाहता। मुझे तो संदेह ही नहीं, विश्वास है कि पूर्णा कभी इस बात पर राजी न होगी। वह मेहनत-मजूरी कर सकेगी, तो करेगी, लेकिन जब तक विवश न हो जाए, हमारी सहायता कभी न स्वीकार करेगी।'

प्रेमा ने बड़ी उत्सुकता से कहा - 'मुझे भी यह संदेह है। राजी होगी भी तो बड़ी मुश्किल से।'

बदरीप्रसाद - 'तुम उससे इसकी चर्चा करना। कल ही।'

प्रेमा - 'नहीं दादा, मुझसे न बनेगा। वह और मैं दोनों ही अब तक बहनों की तरह रही हैं, मुझसे इस ढंग की बात अब न करते बनेगी। मैं तो रोने लगूँगी।'


48 of 297