आँखें सजल हो गईं। दाननाथ तो मुस्करा पड़े, लेकिन अमृतराय का मुख गंभीर हो गया। दाननाथ तो हँसमुख थे, पर विनोद की शैली किसी मर्मांतक वेदना का पता दे रही थी।

अमृतराय ने यह प्रसंग छेड़ कर दाननाथ पर बड़ा एहसान किया, नहीं तो वह यहाँ घंटों गपशप करते रहने पर भी यह प्रश्न मुख पर न ला सकते। अब भी उनके मुख के भाव से कुछ ऐसा जान पड़ा कि यह प्रसंग व्यर्थ छेड़ा गया। बड़े संकोच के साथ बोले - 'हाँ, संदेशा तो आया है, पर मैंने जवाब दे दिया।'

दाननाथ - 'जो मेरे जी में आया।'

'यही कि, मुझे स्वीकार नहीं है।'

'नहीं, यह बात नहीं मैं खुद उसके योग्य नहीं हूँ।'

दाननाथ ने बिजली का बटन दबाते हुए कहा - 'तुम इस काम को जितना आसान समझते हो, उतना आसान नहीं है। कम-से-कम मेरे लिए।'

दाननाथ अब भी निश्चिंत नहीं हुए थे। उनके


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बदरीप्रसाद - 'तो मैं ही सब ठीक कर लूँगा। हाँ, कल शाम मुझे अवकाश न मिलेगा, तब तक तुम्हारी अम्माँ जी से भी बातें होंगी। शायद वह उसके यहाँ रहने पर राजी हो जाएँ।'

कमलाप्रसाद गृह-प्रबंध में अपने को लासानी समझते थे। यों तो बुद्धि विकास में वह अपने को अफलातूं से रत्ती-भर भी कम न समझते थे। पर गृह-प्रबंध में उनकी सिद्धि सर्वमान्य थी। सिनेमा रोज देखते थे, पर क्या मजाल थी कि जेब से एक पैसा भी खर्च करें। मैनेजर से दोस्ती कर रखी थी, उल्टे उसके यहाँ


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