मन में, एक नहीं सैकड़ों बाधाएँ आ रही थीं। इस भय से कि यह नई शंका सुन कर अमृतराय हँस न पड़े, वह स्वयं हँस कर बोले - 'मुझ जैसे लफंगे को प्रेमा स्वीकार करेगी, यह भी ध्यान में आया है जनाब के?'

दाननाथ चिंता में डूब गए। यद्यपि उनकी शंकाओं का प्रतिकार हो चुका था, पर अब भी उनके मन में ऐसी अनेक बातें थीं। जिन्हें वे प्रकट न कर सकते थे। उनका रूप अलक्षित, अव्यक्त था। शंका तर्क से कट जाने पर भी निर्मूल नहीं होती। मित्र से बेवफाई का खयाल उनके दिल में कुछ इस तरह छिप कर बैठा हुआ था कि उस पर कोई वार हो ही नहीं सकता था।

दाननाथ खिड़की के सामने खड़े सिगरेट पी रहे थे। पूछा - 'कैसा खत है?'

'तुम मेरी गरदन पर छुरी चला रहे हो।'

'तो गोली ही क्यों न मार दो कि हमेशा का झंझट मिट जाए।'

यह धमकी अपना काम कर गई। दाननाथ


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कभी-कभी दावत खा आते थे। पैसे का काम धेले में निकालते थे और बड़ी सुंदरता से कभी-कभी लाला बदरीप्रसाद से इस विषय में उनकी ठन भी जाया करती थी। बूढ़े लाला जी बेटे की इस कुत्सित मनोवृत्ति पर कभी-कभी खरी-खरी कह डालते थे। कमलाप्रसाद समझ गए कि लाला जी इस वक्त कोई आपत्ति न सुनेंगे, बल्कि आपत्ति से उल्टा असर होने की संभावना थी। इसलिए उन्होंने कूटनीति से काम लेने का निश्चय किया। प्रातःकाल पूर्णा के द्वार पर जा कर आवाज दी। पूर्णा पहले तो उनसे परदा करती थी,


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