ने पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया और तब बिगड़ कर बोले - 'देख लेना मैं आज संखिया खा लेता हूँ कि नहीं। यह पत्र रखा ही रह जाएगा। 'सबेरे राम नाम सत्त होगी।'

तब अमृतराय ने हँस कर कहा- 'संखिया न हो, तो मैं दे दूँगा। एक बार किसी दवा में डालने के लिए मँगवाई थी।'

अमृतराय अपनी हँसी को न रोक सके।


अध्याय 7

लाला बदरीप्रसाद को दाननाथ का पत्र क्या मिला आघात के साथ ही अपमान भी मिला। वह अमृतराय की लिखावट पहचानते थे। उस पत्र की सारी नम्रता, विनय और प्रण, उस लिपि में लोप हो गए। मारे क्रोध के उनका मस्तिष्क खौल उठा। दाननाथ के हाथ क्या टूट गए, जो उसने अमृतराय से यह पत्र लिखाया। क्या उसके पाँव में मेंहदी लगी थी, जो यहाँ तक न आ सकता था? और यह अमृतराय भी कितना निर्लज्ज है। वह ऐसा पत्र कैसे लिख सकता है! जरा भी शर्म नहीं आई।


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पर अब बहुरिया बन कर बैठने से कैसे काम चल सकता था। उन्हें अंदर बुला लिया। बरामदे में चारपाई पड़ी हुई थी। कमलाप्रसाद बाबू उस पर जा बैठे। एक क्षण में पूर्णा आ कर उनके सामने खड़ी हो गई। पूर्णा का माथा घूँघट से ढका हुआ था, पर दोनों सजल आँखें कृतज्ञता और विनय से भरी हुई भूमि की ओर ताक रही थीं। कमलाप्रसाद उसे देख कर अवाक-सा रह गया। वह इस इरादे से आया था कि इसे किसी भाँति यहाँ से टाल दूँ। मैके चले जाने की प्रेरणा करूँ। उसे इसकी जरा भी


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