लाला दाननाथ जी, आपने अमृतराय से यह पत्र लिखा कर मेरा और प्रेमा का जितना आदर किया है, उसका आप अनुमान नहीं कर सकते। उचित तो यही था कि मैं उसे फाड़ कर फेंक देता और आपको कोई जवाब न देता, लेकिन...

बदरीप्रसाद ने कागज की ओर सिर झुकाए हुए कहा - 'अमृतराय का कोई खत नहीं आया।'

बदरीप्रसाद - 'हाँ, आदमी तो उन्हीं का था, पर खत दाननाथ का था। उसी का जवाब लिख रहा हूँ। महाशय ने अमृतराय से खत लिखाया है और नीचे अपने दस्तखत कर दिए हैं। अपने हाथ से लिखते शर्म आती थी, बेहूदा, शोहदा...'

बदरीप्रसाद- 'यह पड़ा तो है, देख क्यों नहीं लेती?'

बदरीप्रसाद - 'तो देखो। अभी तो शुरू किया है। ऐसी खबर लूँगा कि बच्चा सारा शोहदापन भूल जाए।'

बदरीप्रसाद ने कड़क कर पूछा - 'फाड़ क्यों दिया। तुम कौन होती हो मेरा खत फाड़नेवाली?'


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चिंता न थी कि इस अबला का भविष्य क्या होगा। उसका निर्वाह कैसे होगा, उसकी रक्षा कौन करेगा, इसका उसे लेश-मात्र भी ध्यान न था। वह केवल इस समय उसे यहाँ से टाल कर अपने रुपए बचा लेना चाहता था, पर विधवा की सरल, निष्कलंक, दीन-मूर्ति देख कर उसे अपनी कुटिलता पर लज्जा आ गई। कौन प्राणी ऐसा हृदय-हीन है जो किसी कोमल पुष्प को तोड़ कर भाड़ में फेंक दे। जीवन में पहली बार उसे सौंदर्य का आकर्षण हुआ। अँधेरे घर में दीपक जल उठा। बोले - 'तुम्हें यहाँ अब


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