बदरीप्रसाद - 'हाँ और क्या, लड़की तो तुम्हारी है, मेरी तो कोई होती ही नहीं।'
बदरीप्रसाद - 'दुनिया योग्य वरों से खाली नहीं, एक-से-एक पड़े हुए हैं।'
बदरीप्रसाद - 'उसने अपने हाथ से क्यों खत नहीं लिखा? मेरा तो यही कहना है। क्या उसे इतना भी मालूम नहीं कि इसमें मेरा कितना अनादर हुआ? सारी परीक्षाएँ तो पास किए बैठा है। डॉक्टर भी होने जा रहा है, क्या उसको इतना भी नहीं मालूम? स्पष्ट बात है दोनों मिल कर मेरा अपमान करना चाहते हैं।'
बदरीप्रसाद ने हँस कर कहा - 'मैं तुम्हें तलाश करने गया था।'
बदरीप्रसाद ने झेंपते हुए कहा - 'इतना तो मैं भी समझता हूँ, क्या ऐसा गँवार हूँ?'
बदरीप्रसाद - 'मुझे अब यह अफसोस हो रहा है कि पहले दानू से क्यों न विवाह कर दिया। इतने दिनों तक व्यर्थ में अमृतराय का मुँह क्यों ताकता रहा। आखिर वही करना पड़ा।'
बदरीप्रसाद
अकेले रहने में तो बड़ा कष्ट होगा। उधर प्रेमा भी अकेले घबराया करती है। उसी घर में तुम भी क्यों न चली जाओ। क्या कोई हरज है?'
पूर्णा सिर नीचा किए एक क्षण तक सोचने के बाद बोली- 'हरज तो कुछ नहीं है, बाबूजी यहाँ भी तो आप ही लोगों के भरोसे पड़ी हूँ।'
कमलाप्रसाद - 'तो आज चली चलो। बाबूजी की भी यही इच्छा है। मैं जा कर आदमियों को असबाब ले जाने के लिए भेज देता हूँ।'
पूर्णा - 'नहीं बाबूजी, इतनी जल्दी न कीजिए। जरा सोच लेने दीजिए।'
कमलाप्रसाद - 'इसमें सोचने की कौन-सी बात है। अकेले कैसे पड़ी रहोगी?'