- 'लेकिन प्रेमा उसे स्वीकार करेगी, पहले यह तो निश्चय कर लो। ऐसा न हो, मैं यहाँ हामी भर लूँ और प्रेमा इनकार कर ले। इस विषय में उसकी अनुमति ले लेनी चाहिए।'

बदरीप्रसाद - 'अच्छा, तभी तुम बार-बार मैके जाया करती थी। अब समझा।'

बदरीप्रसाद - 'तुमने अपनी बात कह डाली, तो मैं भी कहे डालता हूँ, मेरा भी एक मुसलमान लड़की से प्रेम हो गया था। मुसलमान होने को तैयार था। रंगरूप में अप्सरा थी, तुम उसके पैरों की धूल को भी नहीं पहुँच सकती। मुझे अब तक उसकी याद सताया करती है।'

बदरीप्रसाद - 'जरा प्रेमा को बुला लो, पूछ लेना ही अच्छा है।'

बदरीप्रसाद - 'रो-रो कर प्राण तो न दे देगी।'

बदरीप्रसाद - 'अच्छा, मैं ही एक बार उससे पूछूँगा। इन पढ़ी-लिखी लड़कियों का स्वभाव कुछ और हो जाता है। अगर उनके प्रेम और कर्तव्य में विरोध हो गया, तो


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पूर्णा - 'अकेली तो नहीं हूँ महरी भी तो यहीं सोने को कहती है।'

कमलाप्रसाद - 'अच्छा, वह बिल्लो। हाँ बुढ़िया है तो सीधी; लेकिन टर्री है। आखिर मेरे घर चलने में तुम्हें क्या असमंजस है?'

पूर्णा - 'कुछ नहीं, असमंजस क्या है?'

कमलाप्रसाद - 'तो आदमियों को जा कर भेज दूँ।'

पूर्णा - 'भेज दीजिएगा, अभी जल्दी क्या है?'

कमलाप्रसाद - 'तुम व्यर्थ ही इतना संकोच कर रही हो पूर्णा, क्या तुम समझती हो तुम्हारा जाना मेरे घर के प्राणियों को बुरा लगेगा?'

कमलाप्रसाद


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