का, थोड़े दिनों में आपकी कलई खुल जाएगी। आप जैसे सरल जीव संसार में न होते तो ऐसे धूर्तों की थैलियाँ कौन भरता?'
कमलाप्रसाद - 'यहाँ इन बातों से नहीं डरते। लगी-लिपटी बातें करना भाता ही नहीं। कहूँगा सत्य ही, चाहे किसी को अच्छा लगे या बुरा। वह हमारा अपमान करते हैं, तो हम उनकी पूजा न करेंगे। आखिर वह हमारे कौन होते हैं, जो हम उनकी करतूतों पर परदा डालें? मैं तो उन्हें इतना बदनाम करूँगा कि वह शहर में किसी को मुँह न दिखा सकेंगे।'
बदरीप्रसाद ने विस्मित हो कर कहा - 'दाननाथ! वह भला क्यों अमृतराय पर आक्षेप करने लगा। उससे जैसे मैत्री है, वैसी तो मैंने और कहीं देखी नहीं।'
बदरीप्रसाद - 'कमलाप्रसाद कहते थे?'
बदरीप्रसाद - 'कमलाप्रसाद झूठ बोल रहा है, सरासर झूठ! दानू को मैं खूब जानता हूँ। उसका-सा सज्जन बहुत कम मैंने देखा है। मुझे
मुझे तुम खूब जानती हो। पं. वसंत कुमार से मेरी कितनी गहरी दोस्ती थी, यह तुमसे छिपा नहीं, प्रेमा तुम्हारी सहेली ही है, अम्माँ जी को तुमसे कितना प्रेम है, वह तुम खूब जानती ही हो, रह गई सुमित्रा, उसे जरा कुछ बुरा लगेगा। तुमसे कोई परदा नहीं, लेकिन उसकी बातों की परवाह कौन करता है? उसे खुश रखने का भी तुम्हें एक गुर बताए देता हूँ। कभी-कभी यह मंत्र फूँक दिया करना, फिर वह कभी तुम्हारी बुराई न करेगी। बस उसकी सुंदरता की तारीफ करती रहना। यह न समझना