दाननाथ की ओर से कोई तैयारी न थी। अमृतराय चंदा करने के लिए बिहार की ओर चले थे और ताकीद कर गए थे कि धूम-धाम मत करना। दाननाथ उनकी इच्छा की अवहेलना कैसे करते।
पूर्णा के आने से कमलाप्रसाद और सुमित्रा एक-दूसरे से और पृथक हो गए। सुमित्रा के हृदय पर लदा हुआ बोझा उठ-सा गया। कहाँ तो वह दिन-ब-दिन विरक्तावस्था में खाट पर पड़ी रहती थी, कहाँ अब वह हरदम हँसती-बोलती रहती थी, कमलाप्रसाद की उसने परवाह ही करना छोड़ दी। वह कब घर में आता है, कब जाता है, कब खाता है, कब सोता है, उसकी उसे जरा भी फिक्र न रही। कमलाप्रसाद लंपट न था। सबकी यही धारणा थी कि उसमें चाहे और कितने ही दुर्गुण हों, पर यह ऐब न था। किसी स्त्री पर ताक-झाँक करते उसे किसी ने न देखा था। फिर पूर्णा के रूप ने उसे कैसे मोहित कर लिया, यह रहस्य कौन
कहूँ। पूर्व जन्म के पापों का प्रायश्चित कर रहा हूँ। सुमित्रा से बोलने को जी नहीं चाहता, पर मुँह से कुछ नहीं कहता कि कहीं घर में कुहराम न मच जाए। लोग समझते हैं, मैं आवारा हूँ, सिनेमा और थिएटर में प्रमोद के लिए जाता हूँ, लेकिन मैं तुमसे सत्य कहता हूँ पूर्णा, मैं सिनेमा में केवल अपनी हार्दिक वेदनाओं को भुलाने के लिए जाता हूँ, अपनी अतृप्त अभिलाषाओं को और कैसे शांत करूँ, दिल की आग को कैसे बुझाऊँ। कभी-कभी जी में आता है, संन्यासी हो जाऊँ और कदाचित एक दिन यही करना