समझ सकता है। कदाचित पूर्णा की सरलता, दीनता और आश्रय-हीनता ने उसकी कुप्रवृत्ति को जगा दिया। उसकी कृपणता और कायरता ही उसके सदाचार का आधार थी। विलासिता महँगी वस्तु है। जेब के रुपए खर्च करके भी किसी आफत में फँस जाने की जहाँ प्रतिक्षण संभावना हो, ऐसे काम में कमलाप्रसाद जैसा चतुर आदमी न पड़ सकता था। पूर्णा के विषय में कोई भय न था। वह इतनी सरल थी कि उसे काबू में लाने के लिए किसी बड़ी साधना की जरूरत न थी और फिर यहाँ तो किसी का भय नहीं, न फँसने का भय, न पिट जाने की शंका। अपने घर ला कर उसने शंकाओं को निरस्त कर दिया था। उसने समझा था, अब मार्ग में कोई बाधा नहीं रही। केवल घरवालों की आँख बचा लेना काफी था और यह कुछ कठिन न था, किंतु यहाँ भी एक बाधा खड़ी हो गई और वह सुमित्रा थी।

सुमित्रा ने कहा - 'अकेली पड़ी-पड़ी क्या करूँ?


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पड़ेगा। तुम समझती होगी, यह महाशय कहाँ का पचड़ा ले बैठे। क्षमा करना, न जाने आज क्यों तुमसे ये बातें करने लगा। आज तक मैंने इन भावों को किसी से प्रकट नहीं किया था। व्यक्ति हृदय ही से सहानुभूति की आशा होती है, बस यही समझ लो। तो मैं जा कर आदमियों को भेजे देता हूँ, तुम्हारा असबाब उठा ले जाएँगे।'

पूर्णा को अब क्या आपत्ति हो सकती थी। उसका जी अब भी इस घर को छोड़ने को न चाहता था, पर वह इस अनुरोध को टाल न सकी। उसे यह भय भी हुआ कि कहीं यह


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