पूर्णा भी यहीं है। क्षमा करना पूर्णा, मुझे मालूम न था। यह देखो सुमित्रा दो साड़ियाँ लाया हूँ। सस्ते दामों में मिल गईं। एक तुम ले लो, एक पूर्णा को दे दो।'
पूर्णा ने सिर हिला कर कहा - 'नहीं, मैं रेशमी साड़ी ले कर क्या करूँगी।'
सुमित्रा - 'छूत की चीज नहीं; पर शौक की चीज तो है। सबसे पहले तो तुम्हारी पूज्य माताजी ही छाती पीटने लगेंगी।'
सुमित्रा - 'बहुत अच्छी हैं, तो प्रेमा के पास भेज दूँ। तुम्हारी बेसाही हुई साड़ी पा कर अपना भाग्य सराहेगी। मालूम होता है, आजकल कहीं कोई रकम मुफ्त हाथ आ गई है। सच कहना, किसकी गर्दन रेती है। गाँठ के रूपए खर्च करके तुम ऐसी फिजूल की चीजें कभी न लाए होगे।'
सुमित्रा - 'माँगते तो वह यों ही दे देते, तिजोरी तोड़ने की नौबत न आती। मगर स्वभाव को क्या करो।'
पूर्णा को सुमित्रा की कठोरता बुरी मालूम हो रही थी। एकांत में कमलाप्रसाद
जिस समय चारों कहार उसका असबाब उठाने के लिए घर आए, वह सहसा रो पड़ी। उसके मन में कुछ वैसे ही भाव जाग्रत हो गए, जैसे शव को उठाते समय शोकातुर प्राणियों के मन में आ जाते हैं। यह जानते हुए भी कि लाश घर में नहीं रह सकती, जितनी जल्द उसका दाहसंस्कार क्रिया हो जाए उतना ही अच्छा है। वे एक क्षण के लिए मोह के आवेश में आ कर पाँव से चिमट जाते हैं, और शोक से विह्वल हो कर करूण स्वर में रूदन करने लगते हैं, वह आत्म-प्रवंचना, जिसमें अब तक उन्होंने