जब तुम मुझी को नहीं गिनतीं, तो वह बेचारी किस गिनती की हैं। भगवान सब दुःख दे, पर बुरे का संग न दे। तुम इनमें से एक साड़ी रख लो पूर्णा, दूसरी मैं प्रेमा के पास भेजे देता हूँ।'

कमलाप्रसाद - 'इनकी करतूतें देखती जाओ! इस पर मैं ही बुरा हूँ, मुझी में जमाने-भर के दोष हैं।'

कमलाप्रसाद - 'मैं तुम्हें तो नहीं देता।'

कमलाप्रसाद - 'तुम उनकी ओर से बोलने वाली कौन होती हो? तुमने अपना ठीका लिया है या जमाने भर का ठीका लिया है। बोलो पूर्णा, एक रख दूँ न? यह समझ लो कि तुमने इनकार कर दिया, तो मुझे बड़ा दुःख होगा।'

यह कह कर उसने कमलाप्रसाद की ओर विवश नेत्रों से देखा। उनमें कितनी दीनता, कितनी क्षमा-प्रार्थना भरी हुई थी। मानो वे कह रही थीं - 'लेना तो चाहती हूँ पर लूँ कैसे! इन्हें आप देख ही रहे हैं, क्या घर से निकालने की इच्छा है?'

कमलाप्रसाद


65 of 180

हो जाने पर भी यहाँ उसकी प्रतिध्वनि आती रहती थी। घर में विचरते हुए उसे अपने सौभाग्य का विषादमय गर्व होता रहता था। आज सौभाग्य-सूर्य का वह अंतिम प्रकाश मिटा जा रहा था, सौभाग्य-संगीत की प्रतिध्वनि एक अनंत शून्य में डूबी जाती थी, वह विषादमय गर्व हृदय को चीर कर निकला जाता था।

संध्या समय वह अपनी महरी बिल्लो के साथ रोती हुई इस भाँति चली मानो कोई निर्वासित हो। पीछे फिर-फिर कर अपने प्यारे घर को देखती जाती थी, मानो उसका हृदय वहीं रह गया हो।

देवकी


65 of 297