ने कोई उत्तर नहीं दिया। साड़ियाँ चुपके से उठा लीं और पैर पटकते हुए बाहर चले गए।
अध्याय 9
साड़ियाँ लौटा कर और कमलाप्रसाद को अप्रसन्न करके भी पूर्णा का मनोरथ पूरा न हो सका। वह उस संदेह को जरा भी न दूर कर सकी, जो सुमित्रा के हृदय पर किसी हिंसक पशु की भाँति आरूढ़ हो गया था। बेचारी दोनों तरफ से मारी गई। कमलाप्रसाद तो नाराज हो ही गया था, सुमित्रा ने भी मुँह फुला लिया। पूर्णा ने कई बार इधर-उधर की बातें करके उसका मन बहलाने की चेष्टा की; पर जब सुमित्रा की त्योरियाँ बदल गईं; और उसने झिड़क कर कह दिया - इस वक्त मुझसे कुछ न कहो पूर्णा, मुझे कोई बात नहीं सुहाती। मैं जन्म से ही अभागिनी हूँ, नहीं तो इस घर में आती ही क्यों? तुम आती ही क्यों! तुम आईं, तो समझी थी और कुछ न होगा, तो रोना ही सुना दूँगी, पर बात कुछ और ही हो गई। तुम्हारा कोई
को सुमित्रा की कोई बात न भाती थी। उसका हँसना-बोलना, चलना-फिरना, उठना-बैठना, पहनना-ओढ़ना सभी उन्हें फूहड़पन की चरम सीमा का अतिक्रमण करता हुआ जान पड़ता था, और वह नित्य उसकी प्रचंड आलोचना करती रहती थी। उसकी आलोचना में प्रेम और सद्भाव का आधिक्य था या द्वेष का, इसका निर्णय करना कठिन था। सुमित्रा तो द्वेष ही समझती थी। इसीलिए वह उन्हें और भी चिढ़ाती रहती थी - देवकी सबेरे उठने का उपदेश करती थी, सुमित्रा पहर दिन चढ़े उठती थी, देवकी घूँघट निकालने