दोष नहीं है, यह तो सब मेरे भाग्य का दोष है। इस वक्त जाओ, मुझे जरा एकांत में रो लेने दो - तब पूर्णा को वहाँ से उठ जाने के सिवा और कुछ सूझ न पड़ा। वह धीरे से उठ कर दबे पाँव अपने कमरे में चली गई। सुमित्रा एकांत में रोई हो, या न रोई हो; पर पूर्णा अपने दुर्भाग्य पर घंटों रोती रही। अभी तक सुमित्रा को प्रसन्न करने की चेष्टा में वह इस दुर्घटना की कुछ विवेचना कर न सकी थी। अब आँखों में आँसुओं की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती हुई वह इन सारी बातों की मन-ही-मन आलोचना करने लगी। कमलाप्रसाद क्या वास्तव में एक साड़ी उसके लिए लाए थे? क्यों लाए थे? एक दिन को छोड़ कर तो वह फिर कभी कमलाप्रसाद से बोली तक नहीं थी। उस दिन भी वह स्वयं कुछ न बोली थी। कमलाप्रसाद की ही बातें सुन रही थी। हाँ, उससे अगर भूल हुई, तो यही कि वह वहाँ आने पर राजी हो गई; लेकिन


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को कहती थी, सुमित्रा इसके जवाब में आधा सिर खुला रखती थी। देवकी महरियों से अलग रहने की शिक्षा देती थी, सुमित्रा महरियों से हँसी-दिल्लगी करती रहती थी। सुमित्रा को पूर्णा का यहाँ आना अच्छा नहीं लग रहा है, यह उससे छिपा न रह सका, पहले ही से उसने पति के इस प्रस्ताव पर नाक सिकोड़ी थी। पर, यह जानते हुए कि इनके मन में जो इच्छा है उसे यह पूरा ही करके छोड़ेंगे, उसने विरोध करके अपयश लेना उचित न समझा था। सुमित्रा सास के मन के भाव ताड़ रही थी। और


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