करती क्या; और अवलंब ही क्या था? कोई आगे-पीछे नजर भी तो नहीं आता था! आखिर जब इन्हीं लोगों का दिया खाती थी,तो यहाँ आने में कौन-सी बाधा थी? जब से वह यहाँ आई, उसने कभी कमलाप्रसाद से बातचीत नहीं की। फिर कमलाप्रसाद ने उसके लिए रेशमी साड़ी क्यों ली? वह तो एक ही कृपण हैं, उदारता उनमें कहाँ से आ गई? सुमित्रा ने भी तो साड़ियाँ न माँगी थीं। अगर उसके लिए साड़ी लानी थी, तो मेरे लिए लाने की क्या जरूरत थी? मैं उसकी ननद नहीं, देवरानी नहीं, जेठानी नहीं, केवल आसरैत हूँ।
लेकिन इस घर को त्याग देने का संकल्प करके भी पूर्णा निकल न सकी? कहाँ जाएगी? जा ही कहाँ सकती है? इतनी जल्दी चला जाना क्या इस लाँछन को और भी सुदृढ़ न कर देगा। विधवा पर दोषारोपण करना कितना आसान है। जनता को उसके विषय में नीची-से-नीची धारणा करते देर नहीं लगती, मानो कुवासना ही
यह भी जानती थी कि पूर्णा भी अवश्य ही ताड़ रही है। इसलिए पूर्णा के प्रति उसके मन में स्नेह और सहानुभूति उत्पन्न हो गई। अब तक देवकी पूर्णा को आदर्श गृहिणी कह कर बखान करती रहती थी। उसको दिखा कर सुमित्रा को लज्जित करना चाहती थी। इसलिए सुमित्रा पूर्णा से जलती थी। आज देवकी के मन में वह भाव न था, इसलिए सुमित्रा के मन में भी वह भाव न रहा।
ग्यारह बजे थे। पूर्णा प्रकाश में आँखें हटा कर खिड़की के बाहर अंधकार की ओर देख रही थी। उस गहरे अँधेरे में