वैधव्य की स्वाभाविक वृत्ति है, मानो विधवा हो जाना मन की सारी दुर्वासनाओं, सारी दुर्बलताओं का उमड़ आना है। पूर्णा केवल करवट बदल कर रह गई।

बारह बजे के पहले तो कमलाप्रसाद कभी अंदर सोने न आते, लेकिन आज एक बज गया, दो बज गए, फिर भी उनकी आहट न मिली। यहाँ तक कि तीन बजे के बाद उसके कानों में द्वार बंद होने की आवाज सुनाई पड़ी। सुमित्रा ने अंदर से किवाड़ बंद कर लिए थे। कदाचित अब उसे भी आशा न रही, पर पूर्णा अभी तक प्रतीक्षा कर रही थी। यहाँ तक कि शेष रात भी इंतजार में कट गई। कमलाप्रसाद नहीं आए।

पूर्णा सारे दिन कमलाप्रसाद से दो-चार बातें करने का अवसर खोजती रही, पर वह घर में आए ही नहीं और मर्दानी बैठक में वह स्वयं संकोच-वश न जा सकी। आज इच्छा न रहते हुए भी उसे भोजन करना पड़ा। उपवास करके लोगों को मनमानी आलोचनाएँ करने का अवसर वह क्यों देती?


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उसे कितने सुंदर दृश्य दिखाई दे रहे थे - वही अपना खपरैल का घर था, वही पुरानी खाट थी, वही छोटा-सा आँगन था, और उसके पतिदेव दफ्तर से आ कर उसकी ओर साहस मुख और सप्रेम नेत्रों से ताकते हुए जेब से कोई चीज निकाल कर उसे दिखाते और फिर छिपा लेते थे। वह बैठी पान लगा रही थी, झपट कर उठी और पति के दोनों हाथ पकड़ कर बोली - 'दिखा दो क्या है? पति ने मुट्ठी बंद कर ली। उसकी उत्सुकता और बढ़ी उसने खूब जोर लगा कर मुट्ठी खोली, पर उसमें कुछ


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