पूर्णा ने मुस्करा कर कहा - 'मैं चलूँगी, यहाँ अकेली कैसे रहूँगी?'

पूर्णा ने बात बनाई - 'बेचारे आ कर लौट गए होंगे।'

पूर्णा - 'मना लेने में कोई बड़ी हानि तो न थी?'

पूर्णा - 'तुम तो हँसी उड़ाती हो। पति किसी कारण रूठ जाए, तो क्या उसे मनाना स्त्री का धर्म नहीं है?'

पूर्णा - 'तुम्हीं अपने दिल से सोचो।'

पूर्णा ने जरा भौहें चढ़ा कर कहा - 'बहन, तुम कैसी बातें करती हो? एक तो ब्राह्मणी, दूसरे विधवा, फिर नाते से बहन, मुझे वह क्या कुदृष्टि से देखेंगे? फिर उनका कभी ऐसा स्वभाव नहीं रहा।'

पूर्णा - 'तो आज क्यों नहीं बीमार पड़ जातीं।'

पूर्णा - 'बड़ी निर्दयी हो बहन, आज चली जाना, तुम्हें मेरी कसम।'

दस-बारह दिन बीत गए थे। एक दिन आधी रात के बाद पूर्णा को सुमित्रा के कमरे का द्वार खुलने की आहट मिली। उसने समझा, शायद कमलाप्रसाद आए हैं। अपने


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न था। वह केवल कौतुक था। आह! उस कौतुक, उस क्रीड़ा में उसे अपने जीवन की व्याख्या छिपी हुई मालूम हो रही थी।'

पूर्णा ने आँसू पोंछ डाले और आवाज सँभाल कर बोली - 'यह तो तुम झूठ कहती हो बहन। यह सोचती तो तुम आती क्यों?'

पूर्णा ने कुछ आशंकित हो कर पूछा - 'तुम अब तक कैसे जाग रही हो?'

पूर्णा - 'तो क्यों सोती हो सारे दिन?'

सुमित्रा हँसने लगी। एक क्षण में सहसा उसका मुख गंभीर हो गया। बोली - 'अपने माता-पिता की धन-लिप्सा का प्रायश्चित कर रही हूँ, बहन और क्या।' यह कहते-कहते उसकी आँखें सजल हो गई।


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