कुछ भी उत्तरदायित्व न था? क्या इस भाँति तटस्थ रह कर तमाशा देखना ही उसका कर्तव्य था? इस सारी मानलीला का मूल कारण तो यही था, तब वह क्या शांतचित्त से दो प्रेमियों को वियोगाग्नि में जलते देख सकती थी? कदापि नहीं। इसके पहले भी कई बार उसके जी में आया था कि कमलाप्रसाद को समझा-बुझा कर शांत कर दे, लेकिन कितनी ही शंकाएँ उसका रास्ता रोक कर खड़ी हो गई थी। आज करूणा ने उन शंकाओं का शमन कर दिया। वह कमलाप्रसाद को मनाने चली। उसके मन में किसी प्रकार का संदेह न था। कमलाप्रसाद को वह शुरू से ही अपना बड़ा भाई समझती आ रही थी, भैया कह कर पुकारती भी थी। फिर उसे उनके कमरे में जाने की जरूरत ही क्या थी? वह कमरे के द्वार पर खड़ी हो कर उन्हें पुकारेगी, और कहेगी - भाभी को ज्वर हो आया है, आप जरा अंदर चले आइए। बस, यह खबर पाते ही कमलाप्रसाद
पर नींद कहाँ? आज ही उसने इस घर में कदम रखा था और आज ही उसे अपनी जल्दबाजी पर खेद हो रहा था। यह निश्चय था कि वह बहुत दिन यहाँ न रह सकेगी।
अध्याय 6
लाला बदरीप्रसाद के लिए अमृतराय से अब कोई संसर्ग रखना असंभव था, विवाह तो दूसरी बात थी। समाज में इतने घोर अनाचार का पक्ष ले कर अमृतराय ने अपने को उनकी नजरों से गिरा दिया। उनसे अब कोई संबंध करना बदरीप्रसाद के लिए कलंक की बात थी। अमृतराय के बाद दाननाथ से उत्तम वर