दौड़े अंदर चले जाएँगे, इसमें उसे लेशमात्र भी संदेह नहीं था। तीन साल के वैवाहिक जीवन का अनुभव होने पर भी पुरुष-संसार से अनभिज्ञ थी। अपने मामा के छोटे-से गाँव में उसका बाल-जीवन बीता था। वहाँ सारा गाँव उसे बहन या बेटी कहता था। उस कुत्सित वासनाओं से रहित संसार में वह स्वछंद रूप से खेत, खलिहान में विचरा करती थी। विवाह भी ऐसे पुरुष से हुआ, जो जवान हो कर भी बालक था, जो इतना लज्जाशील था कि यदि मुहल्ले की कोई स्त्री घर आ जाती, तो अंदर कदम न रखता। वह अपने कमरे से निकली और मर्दाने कमरे के द्वार पर जा कर धीरे से किवाड़ पर थपकी दी। भय तो उसे यह था कि कमलाप्रसाद की नींद मुश्किल से टूटेगी, लेकिन वहाँ नींद कहाँ? आहट पाते ही कमलाप्रसाद ने द्वार खोल दिया और पूर्णा को देखकर कौतूहल से बोला - 'क्या है पूर्णा, आओ बैठो।'
कमलाप्रसाद ने विस्मित
उन्हें कोई और न दिखाई दिया। अधिक खोज-पूछ करने का अब समय भी न था। अमृतराय के इंतजार में पहले ही बहुत बिलंब हो चुका था, बिरादरी में लोग उँगलियाँ उठाने लगे थे। नए संबंध की खोज में विवाह के एक अनिश्चित समय तक टल जाने का भय था। इसलिए मन इधर-उधर न दौड़ा कर उन्होंने दाननाथ ही से बात पक्की करने का निश्चय कर लिया। देवकी ने भी कोई आपत्ति न की। प्रेमा ने इस विषय में उदासीनता प्रकट की। अब उसके लिए सभी पुरुष समान थे, वह किसी के साथ