हो कर कहा - 'मनाने आई थीं, सुमित्रा? झूठी बात। मुझे कोई मनाने नहीं आया था। मनाने ही क्यों लगी। जिससे प्रेम होता है, उसे मनाया जाता है। मैं तो मर भी जाऊँ, तो किसी को रंज न हो। हाँ, माँ-बाप रो लेंगे। सुमित्रा मुझे क्यों मनाने लगी। क्या तुमसे कहती थी?'
कमलाप्रसाद ने मानो यह बात नहीं सुनी। समीप आ कर बोले - 'यहाँ कब तक खड़ी रहोगी। अंदर आओ, तुमसे कुछ कहना है।'
कमलाप्रसाद उसकी घबराहट देख कर पलंग पर जा बैठा और आश्वासन देता हुआ बोला - 'डरो मत पूर्णा, आराम से बैठो मैं भी आदमी हूँ, कोई काटू नहीं हूँ। आखिर मुझसे क्यों इतनी भागी-भागी फिरती हो? मुझसे दो बात करना भी तुम्हें नहीं भाता। तुमने उस दिन साड़ी लौटा दी, जानती हो मुझे कितना दुःख हुआ?'
'कमलाप्रसाद ने यह बात न सुनी। उसकी आतुर दृष्टि पूर्णा के रक्तहीन मुखमंडल पर जमी हुई थी। उसके
जीवन का निर्वाह कर सकती थी। उसकी चलती तो वह अविवाहिता ही रहना पसंद करती, पर जवान लड़की बैठी रहे, यह कुल के लिए घोर अपमान की बात थी। इस विषय में किसी प्रकार का दुराग्रह करके वह माता-पिता का दिल न दुखाना चाहती थी। जिस दिन अमृतराय ने वह भीषण प्रतिज्ञा की, उसी दिन प्रेमा ने समझ लिया कि अब जीवन में मेरे लिए सुख लोप हो गया, पर अविवाहिता रह कर अपनी हँसी कराने की अपेक्षा किसी की हो कर रहना कहीं सुलभ था। आज दो-तीन साल पहले दाननाथ