हृदय में कामवासना की प्रचंड ज्वाला दहक उठी। उसकी सारी चेष्टा, सारी चेतनता, सारी प्रवृत्ति एक विचित्र हिंसा के भाव से आंदोलित हो उठी। हिंसक पशुओं की आँखों में शिकार करते समय जो स्फूर्ति झलक उठती है, कुछ वैसी ही स्फूर्ति कमलाप्रसाद की आँखों में झलक उठी। वह पलंग से उठा और दोनों हाथ खोले हुए पूर्णा की ओर बढ़ा। अब तक पूर्णा भय से काँप रही थी। कमलाप्रसाद को अपनी ओर आते देख कर उसने गर्दन उठा कर आग्नेय नेत्रों से उसकी ओर देखा। उसकी दृष्टि में भीषण संकट तथा भय था, मानो वह कह रही थी - खबरदार। इधर एक जौ-भर भी बढ़े, तो हम दोनों में से एक का अंत हो जाएगा। इस समय पूर्णा को अपने हृदय में एक असीम शक्ति का अनुभव हो रहा था, जो सारे संसार की सेनाओं को अपने पैरों-तले कुचल सकती थी। उसकी आँखों की वह प्रदीप्त ज्वाला, उसकी वह बँधी हुई मुट्ठियाँ और


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ही से उसके विवाह की बातचीत हो रही थी, यह वह जानती ही थी बीच में परिस्थिति न बदल गई होती, तो आज वह दाननाथ के घर होती। दाननाथ को वह कई बार देख चुकी थी। वह रसिक हैं, सज्जन हैं, विद्वान हैं, यह उसे मालूम था। उनकी सच्चरित्रता पर भी किसी को संदेह न था, देखने में भी बहुत ही सजीले-गठीले आदमी थे। ब्रह्मचर्य की कांति मुख पर झलकती थी। उससे उन्हें प्रेम था, यह भी उससे छिपा न था। आँखें हृदय के भेद खोल ही देती हैं। अमृतराय ने हँसी-हँसी में प्रेमा


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