तनी हुई गर्दन देख कर कमलाप्रसाद ठिठक गया, होश आ गए, एक कदम भी आगे बढ़ने की उसे हिम्मत न पड़ी। खड़े-खड़े बोला - 'यह रूप मत धारण करो, पूर्णा। मैं जानता हूँ कि प्रेम-जैसी वस्तु छल-बल से नहीं मिल सकती, न मैं इस इरादे से तुम्हारे निकट आ रहा था। मैं तो केवल तुम्हारी कृपा-दृष्टि का अभिलाषी हूँ। जिस दिन से तुम्हारी मधुर छवि देखी है, उसी दिन से तुम्हारी उपासना कर रहा हूँ। पाषाण प्रतिमाओं की उपासना पत्र-पुष्प से होती है, किंतु तुम्हारी उपासना मैं आँसुओं से करता हूँ। मैं झूठ नहीं कहता पूर्णा। अगर इस समय तुम्हारा संकेत पा जाऊँ, तो अपने प्राणों को भी तुम्हारे चरणों पर अर्पण कर दूँ। यही मेरी परम अभिलाषा है। मैं बहुत चाहता हूँ कि तुम्हें भूल जाऊँ, लेकिन मन किसी तरह नहीं मानता। अवश्य ही पूर्व जन्म में तुमसे मेरा कोई घनिष्ठ संबंध रहा होगा, कदाचित उस जन्म में भी


76 of 180

से इसकी चर्चा भी कर दी थी। यह सब होते हुए प्रेमा को इनका जो कुछ खयाल था, वह इतना ही था कि वह अमृतराय के गहरे दोस्त हैं। उनमें बड़ी घनिष्ठता है। वह धनी नहीं थे, पर यह कोई ऐब न था, क्योंकि प्रेमा विलासिनी न थी। क्यों उसका मन अमृतराय की ओर बढ़ता था और दाननाथ की ओर से खिंचता था, इसका कोई कारण वह स्पष्ट नहीं कर सकती थी, पर इस परिस्थिति में उसके लिए और कोई उपाय नहीं था। फिर भी अब तक उसने दाननाथ को कभी इस दृष्टि से न देखा था।


76 of 297