मेरी यह लालसा अतृप्त ही रही होगी। तुम्हारे चरणों पर गिर कर एक बार रो लेने की इच्छा से ही मैं तुम्हें लाया। बस, यह समझ लो कि मेरा जीवन तुम्हारी दया पर निर्भर है। अगर तुम्हारी आँखें मेरी तरफ से यों ही फिरी रहीं, तो देख लेना, एक दिन कमलाप्रसाद की लाश या तो इसी कमरे में तपड़ती हुई पाओगी, या गंगा-तट पर, मेरा यह निश्चय है।
कमलाप्रसाद चारपाई पर बैठता हुआ बोला - 'नहीं पूर्णा, मुझे तो इसमें लज्जा की कोई बात नहीं दीखती। अपनी इष्ट-देवी की उपासना करना क्या लज्जा की बात है? प्रेम ईश्वरीय प्रेरणा है, ईश्वरीय संदेश है। प्रेम के संसार में आदमी की बनाई सामाजिक व्यवस्थाओं का कोई मूल्य नहीं। विवाह समाज के संगठन की केवल आयोजना है। जात-पात केवल भिन्न-भिन्न काम करने वाले प्राणियों का समूह है। काल के कुचक्र ने तुम्हें एक ऐसी अवस्था में डाल दिया है, जिसमें प्रेम-सुख की
उसने मन में एक संकल्प कर लिया था। अब हृदय में वह स्थान खाली हो जाने के बाद दाननाथ को वहाँ प्रतिष्ठित करने में उसे क्षोभ नहीं हुआ। उसने मन को टटोल कर देखा, तो उसे ऐसा मालूम हुआ कि वह दाननाथ से प्रेम भी कर सकती है। बदरीप्रसाद विवाह के विषय में उसकी अनुमति आवश्यक समझते थे। कितनी ही बातों में वह बहुत ही उदार थे। प्रेमा की अनुमति पाते ही उन्होंने दाननाथ के पास पैगाम भेज दिया।
अंत में बहुत सोचने-विचारने के बाद उन्होंने यही स्थिर किया कि एक