कल्पना करना ही पाप समझा जाता है, लेकिन सोचो तो समाज का यह कितना बड़ा अन्याय है। क्या ईश्वर ने तुम्हें इसीलिए बनाया है कि दो-तीन साल प्रेम का सुख भोगने के बाद आजीवन वैधव्य की कठोर यातना सहती रहो। कभी नहीं, ईश्वर इतना अन्यायी, इतना क्रूर नहीं हो सकता। वसंत कुमार जी मेरे परम मित्र थे। आज भी उनकी याद आती है, तो आँखों में आँसू भर जाते हैं। इस समय भी मैं उन्हें अपने सामने खड़ा रखता हूँ तुमसे उन्हें बहुत प्रेम था। तुम्हारे सिर में जरा भी पीड़ा होती थी, तो बेचारे विकल हो जाते थे। वह तुम्हें सुख में मढ़ देना चाहते थे, चाहते थे कि तुम्हें हवा का झोंका भी न लगे। उन्होंने अपना जीवन ही तुम्हारे लिए अर्पण कर दिया था। रोओ मत पूर्णा, तुम्हें जरा उदास देख कर उनका कलेजा फट जाता था, तुम्हें रोते देख कर उनकी आत्मा को कितना दुःख होगा, फिर यह आज कोई नई बात नहीं। इधर
बार अमृतराय को फिर टटोलना चाहिए। यदि अब भी उनका मत वह बदल सके, तो उन्हें आनंद ही होगा, इसमें कोई संदेह न था। जीवन का सुख तो अभिलाषा में है। यह अभिलाषा पूरी हुई, तो कोई दूसरी खड़ी होगी। जब एक-न-एक अभिलाषा का रहना निश्चित है, तो यही क्यों न रहे? इससे सुंदर, आनंदप्रद और कौन-सी अभिलाषा हो सकती है? इसके सिवा यह भय भी था कि कहीं जीवन का यह अभिनय वियोगांत न हो। प्रथम प्रेम कितना अमिट होता है, यह वह खूब जानते थे।
प्रकाश