महीनों से तुम्हें रोने के सिवा दूसरा काम नहीं है और निर्दयी समाज चाहता है कि तुम जीवन पर्यंत यों ही रोती रहो, तुम्हारे मुख पर हास्य की एक रेखा भी न दिखाई दे, नहीं तो अनर्थ हो जाएगा। तुम दुष्टा हो जाओगी। उस आत्मा को तुम्हारी यह व्यर्थ की साधना देख कर कितना दुःख होता होगा, इसकी कल्पना तुम कर सकती हो? ईश्वर तुम्हें दुःख के इस अपार सागर में डूबने नहीं देना चाहते। वह तुम्हें उबारना चाहते हैं, तुम्हें जीवन के आनंद में मग्न कर देना चाहते हैं। यदि उनकी प्रेरणा न होती, तो मुझ जैसे दुर्बल मनुष्य के हृदय में प्रेम का उदय क्यों होता? जिसने किसी स्त्री की ओर कभी आँख उठा कर नहीं देखा, वह आज तुमसे प्रेम की भिक्षा क्यों माँगता होता? मुझे तो यह दैव की स्पष्ट प्रेरणा मालूम हो रही है।'

कमलाप्रसाद उसे फर्श पर बैठते देख कर उठा और उसका हाथ पकड़ कर कुर्सी पर बिठाने की चेष्टा करते


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की एक सूक्ष्म रेखा चिक में प्रवेश करती हुई अमृतराय के मुख पर पड़ी। अमृतराय चौंक पड़े। वह मुख पीतवर्ण हो रहा था। आठ-दस दिन पहले जो कांति थी, उसका कहीं नाम तक न था। घबरा कर कहा - 'यह तुम्हारी क्या दशा है? कहीं लू तो नहीं लग गई? कैसी तबीयत है?'

दाननाथ हँस पड़े, पर अमृतराय को हँसी नहीं आई। गंभीर स्वर में बोले - 'सारी दुनिया के सिद्धांत चाटे बैठे हो, अभी स्वास्थ्य-रक्षा पर बोलना पड़े तो इस विषय के पंडितों को भी लज्जित कर दोगे, पर इतना नहीं हो सकता कि शाम को सैर ही कर लिया करो।'


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