हुए बोला - 'नहीं-नहीं पूर्णा, यह नहीं, हो सकता। फिर मैं भी जमीन पर बैठूँगा। आखिर इस कुर्सी पर बैठने में तुम्हें क्या आपत्ति है?'

कमलाप्रसाद का चेहरा खिल उठा, बोला - 'अगर कोई कुछ कहे, तो उसकी मूर्खता है। सुमित्रा को यहाँ बैठे देख कर कोई कुछ न कहेगा, तुम्हें बैठे देख कर उसके हाथ आप ही छाती पर पहुँच जाएँगे। यह आदमी के रचे हुए स्वाँग हैं और मैं इन्हें कुछ नहीं समझता। जहाँ देखो ढकोसला, जहाँ देखो पाखंड। हमारा सारा जीवन पाखंडमय हो गया है। मैं इस पाखंड का अंत कर दूँगा। पूर्णा, मैं तुमसे सच कहता हूँ, मैंने आज तक किसी स्त्री की ओर आँख नहीं उठाई। मेरी निगाह में कोई जँचती ही न थी, लेकिन तुम्हें देखते ही मेरे हृदय में एक विचित्र आंदोलन होने लगा। मैं उसी वक्त, समझ गया कि यह ईश्वर की प्रेरणा है। यदि ईश्वर की इच्छा न होती तो तुम इस घर में आती ही


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इन उच्छृंखल शब्दों में विनोद के साथ कितनी आत्मीयता, कितना प्रगाढ़ स्नेह भरा हुआ था कि दोनों ही मित्रों की आँखें सजल हो गईं। दाननाथ तो मुस्करा पड़े, लेकिन अमृतराय का मुख गंभीर हो गया। दाननाथ तो हँसमुख थे, पर विनोद की शैली किसी मर्मांतक वेदना का पता दे रही थी।

अमृतराय ने यह प्रसंग छेड़ कर दाननाथ पर बड़ा एहसान किया, नहीं तो वह यहाँ घंटों गपशप करते रहने पर भी यह प्रश्न मुख पर न ला सकते। अब भी उनके मुख के भाव से कुछ ऐसा जान पड़ा कि यह


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