क्यों? इस वक्त तुम्हारा यहाँ आना भी ईश्वरीय प्रेरणा है, इसमें लेशमात्र भी संदेह न समझना। एक-से-एक सुंदरियाँ मैंने देखीं, मगर इस चंद्र में हृदय को खींचने वाली जो शक्ति है, वह किसी में नहीं पाई।'

कमलाप्रसाद को सहसा साड़ियों की याद आ गई। दोनों साड़ियाँ अभी तक उसने संदूक में रख छोड़ी थीं। उसने एक साड़ी निकाल कर पूर्णा के सामने रख दी और कहा - 'देखो, यह वही साड़ी है पूर्णा, उस दिन तुमने इसे अस्वीकार कर दिया था, आज इसे मेरी खातिर से स्वीकार कर लो। एक क्षण के लिए इसे पहन लो। तुम्हारी यह सफेद साड़ी देख कर मेरे हृदय में चोट-सी लगती है। मैं ईमान से कहता हूँ, यह तुम्हारे वास्ते लाया था। सुमित्रा के मन में कोई संदेह न हो, इसलिए एक और लानी पड़ी। नहीं, उठा कर रखो मत। केवल एक ही क्षण के लिए पहन लो। जरा मैं देखना चाहता हूँ कि इस रंग की साड़ी तुम्हें कितनी खिलती है। न मानोगी तो जर्बदस्ती पहना दूँगा।'


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प्रसंग व्यर्थ छेड़ा गया। बड़े संकोच के साथ बोले - 'हाँ, संदेशा तो आया है, पर मैंने जवाब दे दिया।'

दाननाथ - 'जो मेरे जी में आया।'

'यही कि, मुझे स्वीकार नहीं है।'

'नहीं, यह बात नहीं मैं खुद उसके योग्य नहीं हूँ।'

दाननाथ ने बिजली का बटन दबाते हुए कहा - 'तुम इस काम को जितना आसान समझते हो, उतना आसान नहीं है। कम-से-कम मेरे लिए।'

दाननाथ अब भी निश्चिंत नहीं हुए थे। उनके मन में, एक नहीं सैकड़ों बाधाएँ आ रही थीं। इस भय से


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