कमलाप्रसाद - 'मैं हट जाता हूँ।'
कमलाप्रसाद ने परदे की आड़ से कहा - 'पहन चुकीं? अब बाहर निकलूँ?'
कमलाप्रसाद ने परदा उठा कर झाँका। पूर्णा हँस पड़ी। कमलाप्रसाद ने फिर परदा खींच लिया और उसकी आड़ से बोला - 'अबकी अगर तुमने न पहना पूर्णा, तो मैं आ कर जर्बदस्ती पहना दूँगा।'
पूर्णा - 'पहने हुए तो हूँ। अब कैसे पहनूँ। कौन अच्छी लगती है। मेरी देह पर आ कर साड़ी की मिट्टी भी खराब हो गई।'
कमलाप्रसाद - 'दीपक की ज्योति मात हो गई। वाह रे ईश्वर! तुम ऐसी आलोकमय छवि की रचना कर सकते हो। तुम्हें धन्य है।'
कमलाप्रसाद - 'ईश्वर अब मेरा बेड़ा कैसे पार लगेगा।'
कमलाप्रसाद ने पूछा - 'यहाँ क्यों रखती हो?'
कमलाप्रसाद - 'ईश्वर दंड नहीं देंगे, पूर्णा, यह उन्हीं की आज्ञा है। तुम उनकी चिंता न करो। खड़ी क्यों हो। अभी तो बहुत रात है, क्या अभी से भाग जाने का इरादा है।'
कि यह नई शंका सुन कर अमृतराय हँस न पड़े, वह स्वयं हँस कर बोले - 'मुझ जैसे लफंगे को प्रेमा स्वीकार करेगी, यह भी ध्यान में आया है जनाब के?'
दाननाथ चिंता में डूब गए। यद्यपि उनकी शंकाओं का प्रतिकार हो चुका था, पर अब भी उनके मन में ऐसी अनेक बातें थीं। जिन्हें वे प्रकट न कर सकते थे। उनका रूप अलक्षित, अव्यक्त था। शंका तर्क से कट जाने पर भी निर्मूल नहीं होती। मित्र से बेवफाई का खयाल उनके दिल में कुछ इस तरह छिप कर बैठा हुआ था कि उस पर कोई वार हो ही नहीं सकता था।