कमलाप्रसाद ने जोर दे कर कहा - 'यह कभी नहीं हो सकता पूर्णा, जरूरत पड़े तो तुम्हारे लिए प्राण तक दे दूँ। जब चाहे परीक्षा ले कर देखो।'

कमलाप्रसाद ने मुँह लटका कर कहा - 'पूर्णा, मैं तो मर जाऊँगा। सच कहता हूँ, मैं जहर खा कर सो रहूँगा, और हत्या तुम्हारे सिर जाएगी।'

यह अंतिम वाक्य पूर्णा ने सुना था या नहीं, हम नहीं कह सकते। उसने द्वार खोला और आँगन की ओर चली। कमलाप्रसाद द्वार पर खड़ा ताकता रहा। पूर्णा को रोकने का उसे साहस न हुआ। चिड़िया एक बार दाने पर आ कर फिर न जाने क्या आहट पा कर उड़ गई थी। इतनी ही देर में पूर्णा के मनोभावों में कितने रूपांतर हुए, वह खड़ा यही सोचता रहा। वह रोष, फिर वह हास-विलास, और अंत में यह विराग! यह रहस्य उसकी समझ में न आता था। क्या वह चिड़िया फिर दाने पर गिरेगी? यही प्रश्न कमलाप्रसाद के मस्तिष्क में बार-बार उठने लगा।


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दाननाथ खिड़की के सामने खड़े सिगरेट पी रहे थे। पूछा - 'कैसा खत है?'

'तुम मेरी गरदन पर छुरी चला रहे हो।'

'तो गोली ही क्यों न मार दो कि हमेशा का झंझट मिट जाए।'

यह धमकी अपना काम कर गई। दाननाथ ने पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया और तब बिगड़ कर बोले - 'देख लेना मैं आज संखिया खा लेता हूँ कि नहीं। यह पत्र रखा ही रह जाएगा। 'सबेरे राम नाम सत्त होगी।'

तब अमृतराय ने हँस कर कहा- 'संखिया न हो, तो मैं दे दूँगा। एक बार किसी दवा में डालने के लिए मँगवाई थी।'


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