अध्याय 10

आदर्श हिंदू-बालिका की भाँति प्रेमा पति के घर आ कर पति की हो गई थी। अब अमृतराय उसके लिए केवल एक स्वप्न की भाँति थे, जो उसने कभी देखा था। वह गृह-कार्य में बड़ी कुशल थी। सारा दिन घर का कोई-न-कोई काम करती रहती। दाननाथ को सजावट का सामान खरीदने का शौक था, वह अपने घर को साफ-सुथरा सजा हुआ देखना भी चाहते थे। लेकिन इसके लिए जिस संयम और श्रम की जरूरत है, वह उनमें न था। कोई चीज ठिकाने से रखना उन्हें आता ही न था। ऐनक स्नान के कमरे के ताक पर रख दिया, तो उसकी याद उस वक्त आती जब कॉलेज में उसकी जरूरत पड़ती। खाने-पीने, सोने-जागने का कोई नियम न था। कभी कोई अच्छी पुस्तक मिल गई, तो सारी रात जागते रहे। कभी सरेशाम से सो रहे, तो खाने-पीने की सुध न रही। आय-व्यय की व्यवस्था न थी। जब तक हाथ में रुपए


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अमृतराय अपनी हँसी को न रोक सके।


अध्याय 7

लाला बदरीप्रसाद को दाननाथ का पत्र क्या मिला आघात के साथ ही अपमान भी मिला। वह अमृतराय की लिखावट पहचानते थे। उस पत्र की सारी नम्रता, विनय और प्रण, उस लिपि में लोप हो गए। मारे क्रोध के उनका मस्तिष्क खौल उठा। दाननाथ के हाथ क्या टूट गए, जो उसने अमृतराय से यह पत्र लिखाया। क्या उसके पाँव में मेंहदी लगी थी, जो यहाँ तक न आ सकता था? और यह अमृतराय भी कितना निर्लज्ज है। वह ऐसा पत्र कैसे लिख सकता है! जरा भी शर्म नहीं आई।


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