रहते, बेदरेग खर्च किए जाते, बिना जरूरत की चीजें आया करतीं। रुपए खर्च हो जाने पर, लकड़ी और तेल में किफायत करनी पड़ती थी। तब वह अपनी वृद्ध माता पर झुँझलाते, पर माता का कोई दोष न था। उनका बस चलता तो अब तक दाननाथ चार पैसे के आदमी हो गए होते। वह पैसे का काम धेले में निकलना चाहती थी। कोई महरी, कोई कहार, उनके यहाँ टिकने न पाता था। उन्हें अपने हाथों काम करने में शायद आनंद आता था। वह गरीब माता-पिता की बेटी थी, दाननाथ के पिता भी मामूली आदमी थे और फिर जिए भी बहुत कम। माता ने अगर इतनी किफायत से काम न लिया होता तो दाननाथ किसी दफ्तर के चपरासी होते। ऐसी महिला के लिए कृपणता स्वाभाविक ही थी। वह दाननाथ को अब भी वही बालक समझती थीं जो कभी उनकी गोद में खेला करता था। उनके जीवन का वह सबसे आनंदप्रद समय होता था
लाला दाननाथ जी, आपने अमृतराय से यह पत्र लिखा कर मेरा और प्रेमा का जितना आदर किया है, उसका आप अनुमान नहीं कर सकते। उचित तो यही था कि मैं उसे फाड़ कर फेंक देता और आपको कोई जवाब न देता, लेकिन...
बदरीप्रसाद ने कागज की ओर सिर झुकाए हुए कहा - 'अमृतराय का कोई खत नहीं आया।'
बदरीप्रसाद - 'हाँ, आदमी तो उन्हीं का था, पर खत दाननाथ का था। उसी का जवाब लिख रहा हूँ। महाशय ने अमृतराय से खत लिखाया है और नीचे अपने दस्तखत कर दिए हैं। अपने हाथ से लिखते शर्म आती थी, बेहूदा, शोहदा...'