जब दाननाथ के सामने थाल रख कर वह खिलाने बैठती थी। किसी महाराज या रसोइए, कहार या महरी को वह इस आनंद में बाधा न डालने देना चाहती थीं, फिर वह जिएँगी कैसे? जब तक दाननाथ को अपने सामने बैठ कर खिला न लें, उन्हें संतोष न होता था। दाननाथ भी माता पर जान देते थे, चाहते थे कि यह अच्छे से अच्छा खाएँ, पहनें और आराम से रहें मगर उनके पास बैठ कर बालकों की तोतली भाषा से बातें करने का उन्हें न अवकाश था न रूचि। दोस्तों के साथ गप-शप करने में उन्हें अधिक आनंद मिलता था। वृद्धा ने कभी मन की बात कही नहीं, पर उसकी हार्दिक इच्छा थी कि दाननाथ अपना पूरा वेतन लाकर उसके हाथ में रख दें, फिर वह अपने ढंग पर खर्च करती। तीन सौ रुपए थोड़े नहीं होते, न जाने कैसे खर्च कर डालता है। इतने रूपयों की गड्डी को हाथों से स्पर्श करने का आनंद उसे कभी न मिला


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बदरीप्रसाद- 'यह पड़ा तो है, देख क्यों नहीं लेती?'

बदरीप्रसाद - 'तो देखो। अभी तो शुरू किया है। ऐसी खबर लूँगा कि बच्चा सारा शोहदापन भूल जाए।'

बदरीप्रसाद ने कड़क कर पूछा - 'फाड़ क्यों दिया। तुम कौन होती हो मेरा खत फाड़नेवाली?'

बदरीप्रसाद - 'हाँ और क्या, लड़की तो तुम्हारी है, मेरी तो कोई होती ही नहीं।'

बदरीप्रसाद - 'दुनिया योग्य वरों से खाली नहीं, एक-से-एक पड़े हुए हैं।'

बदरीप्रसाद - 'उसने अपने हाथ से क्यों खत नहीं लिखा? मेरा तो यही


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