था। दाननाथ में या तो इतनी सूझ नहीं थी, या तो लापरवाह थे। प्रेमा ने दो ही चार महीने में घर को सुव्यवस्थित कर दिया। अब हरेक काम का समय और नियम था, हरेक चीज का विशेष स्थान था, आमदनी और खर्च का हिसाब था। दाननाथ को अब दस बजे सोना और पाँच बजे उठना पड़ता था, नौकर-चाकर खुश थे और सबसे ज्यादा खुश थी प्रेमा की सास। दाननाथ को जेब खर्च के लिए पच्चीस रुपए दे कर प्रेमा बाकी रुपए सास के हाथ में रख देती थी और जिस चीज की जरूरत होती, उन्हीं से कहती। इस भाँति वृद्धा को गृह-स्वामिनी का अनुभव होता था। यद्यपि शुरू महीने से वह कहने लगती थीं अब रुपए नहीं रहे, खर्च हो गए, क्या मैं रूपया हो जाऊँ, लेकिन प्रेमा के पास तो पाई-पाई का हिसाब रहता था, चिरौरी-विनती करके अपना काम निकाल लिया करती थी।

उस पर भी दाननाथ के मन में वह शंका बनी हुई


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कहना है। क्या उसे इतना भी मालूम नहीं कि इसमें मेरा कितना अनादर हुआ? सारी परीक्षाएँ तो पास किए बैठा है। डॉक्टर भी होने जा रहा है, क्या उसको इतना भी नहीं मालूम? स्पष्ट बात है दोनों मिल कर मेरा अपमान करना चाहते हैं।'

बदरीप्रसाद ने हँस कर कहा - 'मैं तुम्हें तलाश करने गया था।'

बदरीप्रसाद ने झेंपते हुए कहा - 'इतना तो मैं भी समझता हूँ, क्या ऐसा गँवार हूँ?'

बदरीप्रसाद - 'मुझे अब यह अफसोस हो रहा है कि पहले दानू से क्यों न विवाह कर दिया।


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