थी। वह एक बार उसके अंतस्तल में बैठ कर देखना चाहते थे - एक बार उसके मनोभावों की थाह लेना चाहते थे, लेकिन यह भी चाहते थे कि वह यह न समझे कि उसकी परीक्षा हो रही है। कहीं उसने भाँप लिया तो अनर्थ हो जाएगा, उसका कोमल हृदय उस परीक्षा का भार सह भी सकेगा या नहीं।
आखिर उन्होंने एक दिन कह ही डाला - 'आजकल, आईने में अपनी सूरत देखते हो?'
अमृतराय - 'कोई अंतर है?'
अमृतराय - 'झूठ न बोलो यार, मुझे तो याद ही नहीं आता कि तुम इतने तैयार कभी थे। सच कहता हूँ, मैं तुम्हें बधाई देने जा रहा था। मगर डरता था कि तुम समझोगे यह नजर लगा रहा है।'
अमृतराय अपनी हँसी न रोक सके। दाननाथ को उन्होंने इतना मंद-बुद्धि कभी न समझा था। दाननाथ ने समझा - यह मेरी हँसी उड़ाना चाहते हैं। मैं मोटा हूँ, या दुबला हूँ, इनसे मतलब?
इतने दिनों तक व्यर्थ में अमृतराय का मुँह क्यों ताकता रहा। आखिर वही करना पड़ा।'
बदरीप्रसाद - 'लेकिन प्रेमा उसे स्वीकार करेगी, पहले यह तो निश्चय कर लो। ऐसा न हो, मैं यहाँ हामी भर लूँ और प्रेमा इनकार कर ले। इस विषय में उसकी अनुमति ले लेनी चाहिए।'
बदरीप्रसाद - 'अच्छा, तभी तुम बार-बार मैके जाया करती थी। अब समझा।'
बदरीप्रसाद - 'तुमने अपनी बात कह डाली, तो मैं भी कहे डालता हूँ, मेरा भी एक मुसलमान लड़की से प्रेम हो गया था। मुसलमान